बुधवार, 3 नवंबर 2010

बन्द होँठ मय के प्याले


ऐ मुहज्जब हसीना कुछ हिजाब करो;
साकित होकर न तवालत आप सहो;

है फज्ल खुदा का हुनर दिया जिसने;
बन्द होँठ मय के प्याले मय लगता रिसने;

बुझ जाये तस्नाकामी तब नकाब करो;
ऐ मुहज्जब हसीना कुछ हिजाब करो.......


वस्ल के समय खलती नातमामी आपकी;
आती है याद तब 'अश्क' को शराब की;

है इस्तदआ आकर दूर शराब करो;
ऐ मुहज्जब हसीना कुछ हिजाब करो.........